Zindagi Badal Dene Waale Kabir Ji ke Achhe Dohe ⇨ जिंदगी बदल देने वाले कबीर जी के अच्छे दोहे

Zindagi Badal Dene Waale Kabir Ji ke Achhe Dohe  ⇨ 

नमस्कार दोस्तों कैसे है आप उम्मीद है खुश ही होंगे - परन्तुं सत्य तो यह है कि आज के भाग-दौड़ भरे जीवन में सब दुखी ही दुखी है फिर भी हम कामना करते है आप खुश रहे और  परिवार के साथ अच्छा और सुरक्षित  जीवन व्यतीत  करें । खैर दोस्तों आज हम आपके लिए लेकर आएं है। संत कबीर दास जी के दोहे जिन्होंने अपने विचारों से समूचे संसार को वशीभूत (मंत्रमुग्ध ) करके रख दिया। "Zindagi Badal Dene Waale Kabir Ji ke Achhe Dohe  ⇨ जिंदगी बदल देने वाले कबीर जी के अच्छे दोहे  "तो चलिए दोस्तों शुरू करें -
Zinadgi Badal Dene Waale Kabir Ji ke Achhe Dohe  ⇨ जिंदगी बदल देने वाले कबीर जी के अच्छे दोहे
Zindagi Badal Dene Waale Kabir Ji ke Achhe Dohe
(1) तिनका कबहुँ न निन्दिये,
जो पाँवन तर होय ,
 कबहुँ उडी आँखिन पड़े ,
तो पीर घनेरी होय। 

भावार्थ 🔻
Kabir ji कहते है की एक छोटे से  Tinke की भी
 कभी निंदा न करो जो तुम्हारे पांवों के निचे दब
 जाता है। यदि कभी वह तिनका उड़कर 
आँख (Eyes) में आ गिरे तो कितनी Jyada Peeda होती है।

(2) धीरे-धीरे रे मना,
       धीरे सब कुछ होय ,
        माली सींचे सो घड़ा ,
      ऋतु आये फल होय। 

भावार्थ 🔻
 मन में धीरज रखने से सब कुछ होता है।
 अगर कोई माली किसी पेड़ को सौ घड़े
 पानी से सींचने लगे तब भी 
फल तो ऋतू आने पर ही लगेगा।

(3)  पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुआ ,
पंडित भया न कोय ,
ढाई आखर प्रेम का ,
पढ़े सो पंडित होय। 

भावार्थ 🔻
Big-Big पुस्तकें (Books) पढ़ कर World में
 कितने ही लोग मृत्यु के द्वार पहुँच गए। 
पर सभी विद्वान न हो सके।  कबीर मानते है
 की यदि कोई प्रेम या Love के Only ढाई
 अक्षर ही अच्छी तरह पढ़ ले ,मतलब की 
Love का Real रूप पहचान ले तो वही सच्चा ज्ञानी है

(4) कबीर खड़ा बाजार में ,
 मांगे सबकी खैर ,
ना काहू से दोस्ती ,
न काहू से बैर। 

भावार्थ 🔻
 इस world में आकर कबीर (Kabir) अपने जीवन
 में बस यही चाहते है की सबका भला हो
 और संसार में यदि किसी से दोस्ती
 नहीं ,तो दुश्मनी भी न हो।

(5)  बुरा जो देखण में चला ,
 बुरा न मिलिया कोय ,
 जो दिल खोजा अपना ,
मुझसे बुरा न कोय। 

भावार्थ 🔻
जब में इस संसार में बुराई  Research Karne 
चला तो मुझे कोई बुरा न मिला (Not Found).
 जब  Mene अपने मन में झाँक कर देखा
 तो पाया की मुझसे बुरा कोई नहीं है।

(6) कबीर लहरि समंद की ,
मोती बिखरे आई। 

भावार्थ 🔻
कबीर कहते है की समुन्द्र की लहर में मोती
 आकर बिखर गए। बगुला उनका भेद नहीं
 जानता,परन्तु हंस उन्हें चुन चुन कर खा रहा है
 इसका  Means यह है की किसी भी Vastu 
का महत्व जानकार ही जानता है

(7) कहत सुनत सब दिन गए ,
उरझि न सुरझ्या मन। 

भावार्थ 🔻
कहते सुनते सब दिन निकल गए , पर यह
 मन उलझ कर न सुलझ पाया। कबीर जी कहते है
 की अब भी यह  मन होश में नहीं आता।
 आज भी इसकी अवस्था पहले दिन जैसी ही है।

(8) निंदक  नियरे राखिए ,
आँगन कुटी छवाय ,
बिन पानी ,साबुन बिना
निर्मल करे सुभाय।

भावार्थ 🔻
जो हमारी निंदा करता है ,उसे अधिक से अधिक
 अपने पास ही रखना चाहिए। क्योंकि वह तो साबुन 
और पानी की तरह हमारी कमियां बता कर हमारे
 स्वभाव को साफ़ करता है। मतलब :जैसे साबुन और
 पानी किसी भी मैले कपड़े को धो कर साफ़ और
 स्वच्छ कर देते है वैसे ही हमारी निंदा करने वाले
 हमारी खामियां बता कर हमारे स्वभाव को अच्छा बना देते है।

(9) दुर्लभ मानुष जन्म है ,
देह न बारम्बार, 
तरुवर ज्यों पता झड़े ,
बहुरि न लागे डार।

भावार्थ 🔻
इस संसार में मनुष्य का जन्म बड़ी मुश्किल से मिलता है।
 यह मानव शरीर उसी तरह बार-बार नहीं मिलता। 
जैसे वृक्ष से पत्ते झड़ जाएं तो दोबारा डाल पर नहीं लगते । 

(10) अति का भला न बोलना ,
अति की भली न चूप ,
अति का भला न बरसना ,
अति की भली न धूप। 

भावार्थ 🔻
न तो अधिक बोलना अच्छा है  न ही जरूरत से ज्यादा
 चुप रहना ठीक। जैसे बहुत अधिक वर्षा भी
 अच्छी नहीं और बहुत अधिक धूप भी अच्छी नहीं होती। 
प्रत्येक कार्य सिमा के अंतर्गत होना चाहिए।

(11) बोली एक अनमोल है ,
जो कोई बोले जानि ,
हिये तराजू तोली के ,
तब मुख बाहर आनि।

भावार्थ 🔻
यदि को सही तरीके से बोलना जानता है 
तो उसे पता है की वाणी एक अमूल्य रत्न है।
 इसलिए वह ह्दय के तराजू में तोलकर ही
 अल्फ़ाज़ को उसे मुँह से बाहर आने देता है।

(12) हिन्दू कहें मोहि राम पियारो ,
तुर्क कहें रहमाना 
आपस में दोउ लड़ी-लड़ी मुए ,
मरम न कोउ जाना। 

भावार्थ 🔻
कबीर कहते है कि हिन्दू राम के भक्त है " मुस्लिम" को 
रहमान प्यारा है इसी बात पर दोनों लड़ लड़ कर मौत 
मुंह में जा पहुंचे ,तब भी दोनों में से सच कोई नही  जान पाया।

(13)  चला हँसत हँसता ,
        अपने याद न आवई ,
        जिनका आदि न अंत।

भावार्थ 🔻
यह मनुष्य का स्वभाव है कि जब वह दूसरों 
के दोष देख कर हँसता है तब उसे अपने दोष याद
 नहीं आते  जिनका न  कोई आदि है  और ना ही कोई अंत।

(14) जिन खोजै तीन पाइया ,
 गहरे पानी की पैठ ,
  में बपुरा बूडन डरा ,
 रहा किनारे बैठ।

भावार्थ 🔻
जो प्रयत्न करते है ,वे कुछ न कुछ वैसे ही पा ही लेते है
 जैसे कोई मेहनत करने वाला गोताखोर गहरे पानी
 में जाता है और कुछ लेकर आता है लेकिन कुछ बेचारे
 ऐसे भी होते है जो डूबने के डर से किनारे
 पर ही बैठे रह जाते है और कुछ नहीं कर पाते। 

(15)  माला फेरत जुग भया ,
           फिरा न  मन फेर का फेर ,
       कर का मनका डार दे ,
   मन का  मनका  फेर। 

भावार्थ 🔻
कोई व्यक्ति लम्बे समय तक हाथ में लेकर मोती की माला
 तो घूमाता है पर उसके मन का भाव नहीं बदलता ,
 मन की हलचल शांत नहीं होती , कबीर की ऐसे 
व्यक्ति को सलाह है की हाथ  माला को
 फेरना छोड़कर मन के मोतियों को बदलो या फेरो।

Zindagi Badal Dene Waale Kabir Ji ke Achhe Dohe  ⇨

(16) साधू सा चाहिए ,
          जैसा सूप सुभाय , 
             सार सार को गहि रहै ,
       थोथा देई उड़ाय। 

भावार्थ 🔻
इस संसार में ऐसे Logo की जरूरत है  जैसे अनाज 
Clean करने वाला सूप होता है। 
जो सार्थक को बचा लेंगे और निरर्थक को उड़ा  देंगे।

(17) जब गुण  को गाहक मिले , 
तब गुण लाख बिकाई। 

भावार्थ 🔻
कबीर जी कहते है की जब गुण को परखने वाला
 गाहक मिल जाता है तो गुण  की कीमत होती है
 पर जब  गाहक नहीं मिलता,तब गुण कोड़ी के भाव चला जाता है।

(18) कबीर कहा गरबियो ,
      काल गहे कर केस। 

भावार्थ 🔻
कबीर (kabir) कहते है कि  हे मानव ! तू  Kya गर्व करता है
 काल अपने Haatho में तेरे केश पकडे हुए है 
मालुम नहीं , वह घर या प्रदेश में कहाँ पर ,तुझे मार डाले।

(19)  पानी केरा बुदबुदा ,
         अस मानुस की जात। 

भावार्थ 🔻
कबीर (kabir) जी कहते है कि जैसे पानी के बुलबुले,
 इसी प्रकार मनुष्य का शरीर क्षण भंगुर है
 जैसे प्रभात होते ही तारे छिप जाते है
वैसे ही ये देह भी एक दिन नष्ट हो जायेगी।

(20) हाड़ ज्यूँ लाकड़ी ,
          केस जले ज्यूँ  घास। 

भावार्थ 🔻
यह नश्वर मानव देह अंत समय में लकड़ी की तरह जलती है
 और बाल "केश " घास की तरह जल उठते है
 सम्पूर्ण शरीर को इस तरह जलता देख ,कबीर जी भावुक हो जाते है

(21) जो उग्या सो अन्तबै , 
          फूल्या सो कुमलाहीं। 

भावार्थ 🔻
इस संसार का यही नियम है कि जो उदय हुआ है
 वह अस्त होगा। जो विकसित हुआ है  वह मुरझा जाएगा।
 जो चिना गया है वह गिर पड़ेगा। और जो आया है वह जाएगा।

(22) झूठ सुख को सुख कहे ,
  मानता है मन मोद। 

भावार्थ 🔻
कबीर (kabir) जी कहते है की अरे जीव !
तू झूठे सुख को  Sukh कहता है और मन में प्रसन्न होता है
 देख यह सारा संसार मृत्यु के लिए 
उस भोजन के समान है जो कुछ तो उसके मुंह
 (Mouth) me Hai.और कुछ गोद में खाने के लिए रखा है। 

(23)  संत न छोड़े संतई ,
               जो कोटिक मिले असंत। 

भावार्थ 🔻
सज्जन को चाहे करोड़ो  Dushet पुरुष मिले फिर भी
 वह अपने भले स्वभाव को नही छोड़ता।
 चन्दन के पेड़ से सांप लिपटे रहते है
 But वह अपनी शीतलता नहीं छोड़ता।

(24) कबीर तन पंछी भया ,
              जहाँ मन तहाँ उड़ी जाइ।

भावार्थ 🔻
कबीर कहते है की संसारी व्यक्ति का शरीर पक्षी बन गया है 
और जहाँ उसका मन होता है शरीर उड़कर वहीँ पहुँच जाता है।
 सच है की जो जैसा करता है वह वैसा ही फल पा लेता है।

(25)  तन को जोगी सब करें ,
      मन को बिरला कोई। 

भावार्थ 🔻
 शरीर में भगवे वस्त्र धारण करना Asaan है
 पर मन को योगी बनाना बिरले ही व्यक्तियों का Kaam है।
 यदि मन योगी हो जाए तो सारी सिद्धियाँ 
 सहज ही प्राप्त हो जाती है।

(26) कबीर सो धन संचे ,
         जो आगे को होय। 

भावार्थ 🔻
कबीर (kabir) कहते है की उस धन को Jodo
 जो भविष्य में काम आए। सर पर धन की गठरी
 बाँध कर ले जाते तो  Kisi को नहीं देखा।

(27) माया मुई न मन मुआ ,
      मरी मरी गया शरीर। 

भावार्थ 🔻
कबीर (kabir) कहते है की संसार में रहते हुए न माया मरती है
 न ही मन। शरीर न जाने कितनी बार मर चूका
 पर मनुष्य की आशा और तृष्णा कभी नहीं मरती।

(28)  दुःख में सुमिरन सब करे ,
सुख में करे न कोय। 
 जो सुख में सुमिरन करे 
दुःख काहे को होय।।

भावार्थ 🔻
कबीर (kabir) दास जी कहते है की Dukh ke Time सभी 
भगवान को याद करते है पर Sukh में कोई नहीं करता।
 यदि सुख में भी  God को याद किया जाए तो दुःख हो ही Kyo.

(29)  साईं इतना दीजिये ,
       जा में कुटुम समाय।
 में भी बुखा न रहूँ ,
   साध न बुखा जाए।।

भावार्थ 🔻
कबीर दास जी कहते है की परमात्मा तुम मुझे इतना 
दो की जिसमें बस मेरा गुजारा चल जाए,
में खुद भी अपना पेट पाल सकूं ,और आने 
वाले मेहमानों को भी भोजन करा सकूं।

(30) काल करे सो जो आज कर,
आज करे सो अब।
पल में प्रलय होएगी ,
बहुरि करेगा कब।

भावार्थ 🔻
कबीर दास जी समय की महत्ता बताते हुए कहते है 
की जो कल करना है उसे आज करो और
 जो आज करना है उसे अभी करो , कुछ ही समय
 में जीवन खत्म हो जाएगा। फिर क्या करोगे तुम ?   

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